भगवान कृष्ण की आरती
महत्व एवं विशेषता
कृष्ण आरती, जिसे 'आरती कुंजबिहारी की' के नाम से जाना जाता है, वैष्णव परंपरा की सबसे प्रिय भक्ति रचनाओं में से एक है। भक्ति आंदोलन के विभिन्न संत-कवियों को इसका श्रेय दिया जाता है। यह आरती वृंदावन के बांसुरी बजाने वाले ग्वाले के रूप में भगवान कृष्ण की मनमोहक सुंदरता और दिव्य लीला का वर्णन करती है।
भगवान कृष्ण, विष्णु के आठवें अवतार, हिंदू दर्शन में एक अद्वितीय स्थान रखते हैं — वे परम ब्रह्म भी हैं और अपने भक्तों के अंतरंग सखा भी। भगवद्गीता, जिसमें कृष्ण धर्म, कर्म और भक्ति के सर्वोच्च सत्य प्रकट करते हैं, उन्हें हिंदू धर्म में सबसे दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण देवता बनाती है। फिर भी यह आरती उनके दूसरे आयाम — दिव्य बालक और रोमांटिक प्रेमी — का उत्सव मनाती है, जिन्होंने वृंदावन की चाँदनी कुंजों में गोपियों के साथ रास रचाया।
यह आरती कृष्ण के मनमोहक रूप का जीवंत चित्रण करती है: गले में वैजयंती माला, बांसुरी की मधुर तान, झिलमिलाते कुंडल, और मेघ जैसी श्यामल कांति। राधा, उनकी शाश्वत संगिनी और भक्ति प्रेम की मूर्ति, उनके साथ शोभायमान हैं। वैष्णव धर्मशास्त्र में कृष्ण की सुंदरता स्वयं दिव्य कृपा की अभिव्यक्ति है जो आत्मा को मुक्ति की ओर आकर्षित करती है।
यह आरती मथुरा, वृंदावन, द्वारका और पुरी के कृष्ण मंदिरों में दैनिक पूजा का अभिन्न अंग है। कृष्ण जन्माष्टमी और होली — कृष्ण की चंचल प्रकृति से जुड़ा रंगों का त्योहार — के दौरान यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस्कॉन आंदोलन ने इस आरती को विश्वभर में प्रसारित करने में सहायता की है।
Hindi Lyrics (मूल पाठ)
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की। गले में वैजयंती माला, बजावे मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नन्द के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक। ललित छवि श्याम प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ कनक मय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसै। गगन सो सुमन रासि बरसै, बजत मुरली मधुर बाजै। बृज की नारि संग रस रचावै, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणी श्री गंगा। स्मरण ते अधर सुधा बरसै, बंसी बजै तान सरसै। भक्तन के संकट हरनी, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।