📜 Sunderkand Hanuman's Journey - From Ramcharitmanas by Tulsidas
1. Beginning
प्रारंभ
Hanuman's journey begins
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्॥ १ ॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २ ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३ ॥
जामवंत के बचन सुहाए
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥१॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहँ माथा
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ २॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ ३॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ ४॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी
तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥ ५॥
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ १॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा
जानैं कहँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ १॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ २॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना
ग्रसिस न मोहि कहेउ हनुमाना॥ ३॥
जोजन भरि तिहिं बदनु पसारा
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ ४॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा
तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ ५॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ ६॥
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २॥
निसिचरि एक सिंधु महँ रहई
करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ १॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ ३॥
नाना तरु फल फूल सुहाए
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥ सैल बिसाल देखि एक आगें
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा
कनक कोटि कर परम प्रकासा॥ ६॥
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै
बहरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ १॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ ३॥
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३॥
मसक समान रूप कपि धरी
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी
रुधिर बमत धरनीं डनमनी॥ २॥
पुनि संभारि उठी सो लंका
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे
तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहुता
देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४॥
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४॥
2. Entering Lanka
लंका प्रवेश
Hanuman enters Lanka and meets Vibhishana
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ १॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही
राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ २॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ ३॥
सयन किएँ देखा कपि तेही
मंदिर महँ न दीख बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ ४॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ ५॥
लंका निसिचर निकर निवासा
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥ मन महँ तरक करैं कपि लागा
तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ १॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी
साधु ते होइ न कारज हानी॥ २॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ ३॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी
आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ४॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी
जिमि दसनन्हि महँ जीभ बिचारी॥ तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥ १॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता॥ २॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती
करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा
तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥ ४॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोह पर रघुबीर
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७॥
जानतहुँ अस स्वामि बिसारी
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥ तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता
देखी चहउँ जानकी माता॥ २॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥ करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ
बन असोक सीता रह जहवाँ॥ ३॥
3. Meeting Sita
सीता मिलन
Hanuman finds and meets Sita
देखि मनहि महँ कीन्ह प्रनामा
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥ कृस तनु सीस जटा एक बेनी
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥ ४॥
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८॥
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई
करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा
संग नारि बहु किएँ बनावा॥ १॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा
साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी
मंदोदरी आदि सब रानी॥ २॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा
एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥४॥
सठ सूनेहु हरि आनेहि मोही
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५॥
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९॥
सीता तैं मम कृत अपमाना
कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना॥ नाहिं त सपदि मानु मम बानी
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥ १॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर
प्रभु भुज करि कर सम दसकंदर॥ सो भुज कंठ कि तव असि घोरा
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥ २॥
चंद्रहास हरु मम परितापं
रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा
कह सीता हरु मम दुख भारा॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥
मास दिवस महँ कहा न माना
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका
राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना
सीतहि सेइ करह हित अपना॥ १॥
सपनेँ बानर लंका जारी
जातुधान सेना सब मारी॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥ २॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥ ३॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥ ४॥
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई
दुसह बिरह अब नहिं सहि जाई॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला
मिलहि न पावक मिटहि न सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा
अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४॥
पावकमय ससि स्वत न आगी
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५॥
नूतन किसलय अनल समाना
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६॥
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चिकति चितव मुदरी पहिचानी
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १॥
जीति को सकइ अजय रघुराई
माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई
कहि सो प्रगट होइ किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४॥
राम दूत मैं मातु जानकी
सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ ५॥
नर बानरहि संग कह कैसें
कहि कथा भई संगति जैसें॥ ६॥
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३॥
हरिजन हानि प्रीति अति गाढ़ी
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना
भयहु तात मो कहँ जलजाना॥ १॥
अब कह कुसल जाउँ बलिहारी
अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ कोमलचित कृपाल रघुराई
कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ २॥
सहज बानि सेवक सुख दायक
कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥ कबहुँ नयन मम सीतल ताता
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥ ३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी
अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥ देखि परम बिरहाकुल सीता
बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ जनि जननी मानहु जियँ ऊना
तुम्ह ते प्रेमु राम केँ दूना॥ ५॥
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४॥
4. Ram's Message
राम का संदेश
Ram's message of love and reassurance to Sita
कहेउ राम बियोग तव सीता
मो कहँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू
कालनिसा सम निसि सासि भानू॥ १॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेइ पीरा
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥
कहहु तें कछु दुख घटि होई
काहि कहौं यह जान न कोई॥ तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ प्रभु संदेसु सुनत बैदेही
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥ उर आनहु रघुपति प्रभुताई
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५॥
जौं रघुबीर होइ सुधि पाई
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥ राम बान रबि उएँ जानकी
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥ २॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना
जातुधान अति भट बलवाना॥ ३॥
मोरें हृदय परम संदेहा
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा
समर भयंकर अतिबल बीरा॥ ४॥
सीता मन भरोस तब भयऊ
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥ ५॥
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६॥
मन संतोष सुनत कपि बानी
भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना
होहु तात बल सील निधाना॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥
बार बार नाएसि पद सीसा
बोला बचन जोरि कर कीसा॥ अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥ ३॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा
लागि देखि सुंदर फल रूखा॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी
परम सुभट रजनीचर भारी॥ ४॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥ ५॥
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७॥
5. Garden Destruction
वाटिका विनाश
Hanuman destroys Ashok Vatika and battles demons
चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा
फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ १॥
नाथ एक आवा कपि भारी
तेहिं असोक बाटिका उजारी॥ खाएसि फल अरु बिटप उपारे
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ २॥
सुनि रावन पठए भट नाना
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥ सब रजनीचर कपि संघारे
गए पुकारत कछु अधमारे॥ ३॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा
चला संग लै सुभट अपारा॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥ ४॥
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना
पठएसि मेघनाद बलवाना॥ मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥ १॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ कपि देखा दारुन भट आवा
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥ २॥
अति बिसाल तरु एक उपारा
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे महाभट ताके संगा
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥ ३॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई
ताहि एक छन मुरुछा आई॥ ४॥
उठि बहोरि कीन्हसि बहु माया
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ ५॥
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ १९॥
ब्रह्मबान कपि कहँ तेहिं मारा
परेउँ भूमि कटकु संघारा॥ तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ
नागपास बांधेसि लै गयउ॥ १॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा
प्रभु कारज लगि कपिहि बँधावा॥ २॥
6. Before Ravana
रावण के सम्मुख
Hanuman is brought before Ravana in his court
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥ दसमुख सभा दीख कपि जाई
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ ३॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप न कपि मन संका
जिमि अहिगन महँ गरुड़ असंका॥ ४॥
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥ २०॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा
केहिं केँ बल घालेहि बन खीसा॥ की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही
देखउँ अति असंक सठ तोही॥ १॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा
कह सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥ सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया
पाइ जासु बल बिरचत माया॥ २॥
जाकेँ बल बिरंचि हरि ईसा
पालत सृजत हरत दससीसा॥ जा बल सीस धरत सहसानन
अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता
तुम्ह से सठन्ह सिखावन दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली
बधे सकल अतुलित बलसाली॥ ४॥ ५॥
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१॥
जानेउ मैं तुम्हारि प्रभुताई
सहसबाहु सन परी लराई॥ समर बालि सन करि जसु पावा
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥ सब केँ देह परम प्रिय स्वामी
मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥ मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी
छमा तजि भजहु भगत भय हारी॥ ४॥
जाकेँ डर अति काल डेराई
जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै
मोरे कहेँ जानकी दीजै॥ ५॥
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि
गएँ सरन प्रभु राखहहिं तव अपराध बिसारि॥ २२॥
राम चरन पंकज उर धरहू
लंकाँ अचल राज तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी
सब भूषन भूषित बर नारी॥ २॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई
जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं
बरिष गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥ ३॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥ ४॥
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३॥
जदपि कहि कपि अति हित बानी
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १॥
मृत्यु निकट आई खल तोही
लागेसि अधम सिखावन मोही॥ उलटा होइहि कहु हनुमाना
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता
नीति बिरोध न मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई
सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५॥
7. Tail on Fire
पूँछ में आग
Hanuman's tail is set on fire and he burns Lanka
कपि केँ ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४॥
पूँछ हीन बानर तहँ जाइहि
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥ जिन्ह कइ कीन्हसि बहुत बड़ाई
देखउँ मैं तिन्ह कइ प्रभुताई॥ १॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना
भइ सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान सुनि रावन बचना
लागे रचे मूढ़ सोइ रचना॥ २॥
रहा न नगर बसन घृत तेला
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहुँ आए पुरबासी
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥ पावक जरत देखि हनुमंता
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥ ४॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं
भइँ सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ २५॥
देह बिसाल परम हरुआई
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला
झपट लपट बहु कोटि कराला॥ १॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई
बानर रूप धरेँ सुर कोई॥ २॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥ जारा नगर निमिष एक माहीं
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ३॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥ उलटि पलटि लंका सब जारी
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४॥
8. Return to Ram
राम के पास वापसी
Hanuman returns victoriously to Ram
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि
जनकसुता केँ आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ २६॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा
जैसेँ रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥ १॥
कहहु तात अस मोर प्रनामा
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरद सँुभारी
हरहु नाथ मम संकट भारी॥ २॥
तात सठसुत कथा सुनाएहु
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ मास दिवस महुँ नाथ न आवा
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३॥
कह कपि केहि बिधि राखउँ प्राना
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥ तोहि देखि सीतलि भइ छाती
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ ४॥
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी
गर्भ स्रविहिं सुनि निसिचर नारी॥ नाघि सिंधु एहि पारहि आवा
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥ १॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥ मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥ २॥
मिले सकल अति भए सुखारी
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥ चले हरिष रघुनायक पासा
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥ ३॥
तब मधुबन भीतर सब आए
अंगद संमत मधु फल खाए॥ रखवारे जब बरजन लागे
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥ ४॥
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज
सुनु सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ २८॥
जौं न होति सीता सुधि पाई
मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥ एहि बिधि मन बिचार करि राजा
आइ गए कपि सहित समाजा॥ १॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ पूँछी कुसल कुसल पद देखी
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना
राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥ सुनि सुग्रीव बहोरि तेहि मिलेऊ
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥ ३॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा
किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥ फटिक सिला बैठे द्वौ भाई
परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ ४॥
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ २९॥
जामवंत कह सुनु रघुराया
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ १॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥ प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू
जन्म हमार सुफल भा आजू॥ २॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
